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आयुष्मान खुराना की ये फिल्म समाज को आईना दिखाती है

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आयुष्मान खुराना की ये फिल्म समाज को आईना दिखाती है

आर्टिकल 15, आयुष्मान खुराना की ये फिल्म भारतीयय कॉन् के उस प्रावधान को मूल में रखती है जिसमें लिखा गया है कि किसी भी नागरिक के साथ जाति, अमीर या लिंग से जुड़े भेदभाव नहीं किया जाएगा। यह फिल्म एक निर्णायक निर्णय पर खत्म होती है और कोई बहुत बड़ा उपदेश नहीं देती है।

आईपीएस ऑफिसर अयन रंजन (आयुष्मान खुराना) को उत्तर प्रदेश के लालगांव में पोस्टिंग मिली है। फिल्म के पहले ही दृश्य में गांव के गरीब लोग एक गीत गाते दिखते हैं। वहीं एयरकंडीशन गाड़ी में बैठे आयुष्मान खुराना विषैली हवाओं की बात कर रहे हैं। ये दो दुनिया के लोग हैं जो जल्द ही एक दूसरे से टकराने वाले हैं।

बीच-बीच में अनुभव सिन्हा ऐसे सीन दिखाने वाले हैं जो इस बात की ओर इशारा करते हैं कि जल्दी ही एक टकराव आने वाला है और बेहतरीन तरीके से सस्पेंस को तैयार किया जाता है।

कहानी

इस फिल्म में आयुष्मान खुराना के साथ कास्ट की भी हो रही है तारीफ

इस यात्रा के दौरान ही आयुष्मान का ड्राइवर उन्हें एक कहानी सुनाता है। लोक कहानियों के अनुसार जब राम लंका पर विजय प्राप्त कर अयोध्या लौटे तो हर गांव में खुशियां मनाई गई और गांव-गांव में रोशनी फैलाई गई।

एक गांव में रोशनी किसी कारण से नहीं हो सकी और फिर उस गांव के लोगों ने देखा कि गांव अंधेरे में रहने से महल और चमकदार दिख रहा है। केवल से इस गांव के लोग अंधेरे में रहते हैं और ये इस बात की ओर इशारा करता है कि कैसे छोटे लोग अधिक ताकतवर लोगों के लिए बलिदान और बलिदान करते आए हैं।

अयन को धीरे-धीरे समझ आने वाला लगता है कि सब कुछ समान रूप से नहीं दिखता है। उसे गांव के जातिवादी तरीकों और परंपराओं से दो-चार होना पड़ता है। एक दुकान से पानी खरीदने से उसे मना किया जाता है क्योंकि दुकानदार एक खास जाति से जुड़ा होता है।

उनके साथी, खासतौर पर ब्रह्मदत्त (मनोज पाहवा) नहीं चाहते कि वे गांव के लोकल मुद्दों में ज्यादा भाग लें। इससे गाँव के जातिगत समीकरण बिगड़ने की आशंका है। इसी बीच गांव में तीन लड़कियां गायब हो जाती हैं। ऐसा लगता है कि इस मामले में किसी की दिलचस्पी नहीं है लेकिन तब आयुष्मान इस मामले को अपने हाथ में लेते हैं।

हिलाने वाली कहानी

अनुच्छेद 15 की समीक्षा

पुलिस अधिकारी के किरदार में आयुष्मान इन्फ करते हैं

अनुभव सिन्हा और लेखक गौरव सोलंकी ने इस विषमता से भरे अपराध और मानवता को दर्शाती कहानी को सरलता से पर्दे पर उभार दिया है। उनके लेखन में एक शिष्टता है और इस कहानी में धार भी है। फिल्म कहीं भी निर्देशक की पकड़ से बाहर नहीं होती है। फिल्म के किरदार और किस्से हर जगह जातिगत व्यवस्था से उपजे दबाव को सक्षम तरीके से दिखाते हैं।

आर्टिकल 15 एक शानदार फिल्म है क्योंकि वह उपदेश नहीं देती है। वो बस आईना दिखाती है, सालों से जाति व्यवस्था में उलझे इस समाज को जो मॉर्डन समाज के समानता और स्वतंत्रता के आदर्शों को धता बताती रही है।

कुमुद शर्मा, मनोज पाहवा, सयानी गुप्ता, मोहम्मद ज़हान आश्रय और एम। नासिर जैसे कलाकारों की सपोर्टिंग कास्ट ने बेहतरीन काम किया है। वहीं लीड में आयुषमान ने अपना काम बहुत सधे हुए तरीके से किया है। खुराना, बतौर पुलिस, बॉलीवुड के उन पुलिसवालों से अलग हैं जो डॉयलॉगबाज़ी करते नज़र आते हैं। वह एक ‘दबंग’ पुलिस वाले नहीं है जो विलेन को हवा में उड़ा दे, वह सही की समझ रखता है और चीज़ों को ठीक चाहता है। आयुष्मान ने जिस तरह से इस किरदार को प्लेया है वह काबिल ए तारीफ है।

तुम बिन, रा वन और दस जैसी फिल्में बनाने वाले अनुभव सिन्हा को सामाजिक मुद्दों की शक्ल में अपनी ताकत मिल गई है। वो फिल्मी तड़क भड़क में मूलतः मुद्दों को दिखाने की कला को पकड़ चुके हैं और इसलिए एक बेहतरीन फिल्म बनाते हैं। मुल्क के साथ उन्होंने अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई थी और लोगों को इस बात के लिए मजबूर किया था कि वे उनके काम की ओर ध्यान दें। लेकिन इस फिल्म के साथ उन्होंने खुद को साबित कर दिया है।

ये भी पढ़ें – आर्टिकल 15 की रिलीज पर डायरेक्टर अनुभव सिन्हा ने ओपन लैटर लिखा है

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