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इज़राइल में दो साल में चार चुनाव क्यों नेतन्याहू के लिए मायने रखते हैं

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इज़रायल में 2019 से अब तक चार बार चुनाव हो चुके हैं.

इज़रायल में बीते मंगलवार को जो चुनाव संपन्न हुए, वह पिछले दो वर्षों में चौथे चुनाव थे। चुनावों के बाद प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू (बेंजामिन नेतन्याहू) जीत का दावा तो किया है, लेकिन बहुमत के आंकड़े को लेकर स्थिति साफ नहीं है। इज़रायल के सबसे लंबे समय तक पीएम (इज़राइल पीएम) रहने वाले नेतन्याहू को एक बार फिर सरकार बनाने के लिए काफी जद्दोजहद करना पड़ रहा है और उन्हें उम्मीद है कि वे दक्षिणपंथियों (राइट विंग) का समर्थन जुटा लेंगे। लेकिन यह सवाल है कि दो सालों में बार-बार चुनाव होने के पीछे रहस्य क्या है?

एग्ज़िट पोल भी कह रहे हैं कि 120 संसदीय सीटों के लिए चुनाव में नेतन्याहू जीत दर्ज कर सकते हैं। गौरतलब यह है कि चुनाव से पहले यह कठिन माना जा रहा था क्योंकि कोरोनावायरस की चपेट में इज़रायल की आधी आबादी यानी लगभग 90 लाख लोग संवेदनशील हो चुके थे। हालाँकि, अब देखते हैं कि इज़रायल में लगातार हो रहे चुनावों का माजरा क्या है।

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क्यों बार-बार चुनाव हो रहे हैं?इज़रायल की राजनीति ति में दो ध्रुव हैं, एक तो नेतन्याहू के नेतृत्व वाले धार्मिक और कंज़र्वेटिव गुट है और दूसरा उनका विरोधी मध्यमार्गी और सेक्युलर। अप्रैल और सितंबर 2019 में दो बार इज़रायल में चुनाव हुए लेकिन दोनों बार ऐसा हुआ कि किसी भी गुट को इतनी सभाएं नहीं मिलीं कि सरकार बनाई जा सके।

नेतन्याहू और उनके विरोधी बेनी गैंटजेन

त्रिशंकु संसद की स्थिति में नेतन्याहू कैरटेकर सरकार चला रही है, जिसमें सरकार की शक्तियां न के बराबर हो जाती हैं यानी वे बजट तक सेट करने के लायक नहीं रहते हैं। इज़रायल के सिस्टम के मुताबिक इस तरह की समस्या से निपटने का सिर्फ एक ही हल है कि जब तक कोई सरकार बहुमत से न न हो जाए, तब तक चुनाव करवाए जाएं।

सरकार क्यों नहीं बन सकी?
इस सवाल का जवाब यह है कि इज़रायल में राजनीतिक आरोप प्रत्यारोप के कारण धारणाएँ बिल्कुल अलग हो गई हैं। नेतन्याहू पर रिश्वतखोरी, फ्रॉड और विश्वासघात जैसे संगीन आरोप लगे। वे पहले इज़राइली पीएम बने, जिनके खिलाफ पद पर रहते हुए ट्रायल चला गया। हालांकि नेतन्याहू ने इन आरोपों से साफ तौर पर इनकार किया, लेकिन इस पूरे विवरण से वोटर दो ध्रुवों के बीच बंटे हुए ही दिखे।

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मार्च 2020 में अगले चुनाव का ऐलान किया गया और इस बार नेतन्याहू के लिकुड को 36 मिनट मिलीं, जब कि उनके प्रमुख प्रतिद्वंद्वी दल को 33 लेकिन नियति को मंज़ूर नहीं था कि सरकार बनी। अप्रैल से ही कोरोनावायरस के कारण लॉकडाउन की नौबत बनी और अर्थव्यवस्था को करारा झटका साफ दिख रहा था।

33 और जीत के बावजूद ब्लू एंड व्हाइट गठबंधन के बेनी गैंट्ज़ की पार्टी ने 61 जनप्रतिनिधियों का समर्थन जुटा लिया था और सरकार बनाने की कवायद की थी, लेकिन इमरजेंसी स्थितियों के कारण यह प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी। गैंट्ज़ और नेतन्याहू के बीच एक इमरजेंसी सरकार बनाने की डील हुई जिसके तहत 3 साल की सरकार को दोनों डेढ़ डेढ़ साल चलाने वाले थे।

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सुप्रीम कोर्ट ने भी इस डील पर मुहर लगाई थी, लेकिन बजट को लेकर जब स्थितियां सुलझ गईं तो मार्च 2021 में फिर चुनाव करवाए जाने का रास्ता खोजा गया।

कैसे अहम हो गया है यह चुनाव?
यह तो साफ बात है कि इज़रायल पिछले दो साल से एक कानूनडे की सरकार की ज़रूरत महसूस कर रहा है। इस चुनाव से पहले एक महत्वपूर्ण मोड़ यह भी रहा कि जनवरी में पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इज़रायल और उनके दुश्मन दुश्मन फलीस्तीन के बीच एक समझौते की पेशकश की। इस पेशकश को दोनों ओर से आलोचना मिली यानी फलीस्तीन ने कहा कि उसे पूरा अधिकार नहीं मिला तो इज़रायल ने कहा कि उन्हें उम्मीद के मुताबिक फलीस्तीनी ज़मीन नहीं दी गई।

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एक कार्यक्रम में मौजूद गैंट्ज और नेतन्याहू।

हालाँकि, ट्रम्प के इस स्नेह से नेतन्याहू और गैंट्ज़ दोनों ने सहमति जताई थी। इस पूरे विवरण के बाद इस बार का चुनाव इसलिए भी महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि नेतन्याहू पीएम बन जाते हैं तो यह पहली बार होगा कि आपराधिक मुकदमा झेल चुके कोई पीएम शीर्ष पद पर चुना जाएगा। एक तरफ गैंट्ज़ इज़रायल की डेमोक्रेसी के लिए नेतन्याहू कोone बता रहे हैं तो नेतन्याहू कह रहे हैं कि गैंट्ज़ देश चलाने के काबिल नहीं हैं, केवल वही अनुभव रखते हैं कि देश चले जाएं।

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इस बार भी नहीं बनी सरकार तो?
यह सुनने और कहने में ही बड़ी अजीब बात है कि चौथी बार भी किसी पार्टी के स्पष्ट रूप से सरकार बनाने के आसार नज़र नहीं आ रहे हैं। जान कह रहे हैं कि साफ तौर पर यह राजनीतिक पक्ष के प्रति जनता का अविश्वास ही जाहिर करता है। साथ ही, चुनाव करवाना खर्चीली प्रक्रिया है और इस बार भी अगर कोई साफ नतीजा नहीं आता है तो एक और चुनाव से बचने के लिए या तो सुप्रीम कोर्ट कोई दखल दे सकता है या फिर राजनीतिक दलों को किसी तरह के समझौते का रास्ता खोज सकता है।

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