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कोरोना वैक्सीन अपव्यय के मामले में उत्तर प्रदेश में सुधार

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कोरोना वैक्सीन अपव्यय के मामले में उत्तर प्रदेश में सुधार

लखनऊ: देशभर में कोरोना वैक्सीनेशन का काम 16 जनवरी से शुरू हुआ है। अभी तक कुल पांच करोड़ लोगों को कोरोना वैक्सीन की खुराक दी जा चुकी है। वर्तमान में देशभर में कोरोना वैक्सीन के वेस्टेज के कई मामले देखे गए हैं। जिनके बारे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राज्यों के मुख्य सचिवों के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग भी की है।

कोरोना वैक्सीन वेस्टेज के मामले में तीसरे स्थान पर उत्तर प्रदेश

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के दौरान कोरोना वैक्सीन के वेस्टेज पर चिंता जाहिर की है। वहीं वैक्सीन वेस्टेज के मामले में उत्तर प्रदेश तीसरे स्थान पर रहा। जहां वैक्सीन की बर्बादी 9.4 प्रतिशत थी। हालांकि इसके बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने इस पर कड़ी निगरानी के निर्देश दिए हैं। जिसके बाद इसका असर भी देखने को मिला। अब यूपी में वैक्सिन की वेस्टेज 7.3 फीसदी तक आ गई है। आज हम आपको बताएंगे कि आखिर वैक्सीन के किनारे होने की क्या प्रमुख वजहें हैं।

जानिए क्या है वेस्टेज के मुख्य कारण

इस वैक्सीन के वेस्ट होने के कई कारण हैं, जिनमें सबसे ज्यादा वेस्ट होने का कारण पहले कॉवैक्सिन के एक वॉयल में 20 डोज का होना भी शामिल था। जब ये वैक्सीन आई तब लोग वैक्सीन लगवाने में काफी हिचकते थे, और उस वक्त को जीवाक्सीन 1 वॉयल में 20 डॉज होता था और पूरे वॉयल को 4 घंटे के भीतर इस्तेमाल करना होता था।

वहीं कई बार सेशन में महज 5-6 लोग ही आते थे और पूरी शीशी खोलनी पड़ती थी। जो कि 4 घंटे के बाद उपयोग ना होने के कारण बाकी बची 15 डोज पूरी हो जाती थी। हालांकि अब covaxin ने अपने वॉयल में बदलाव किया है और अब 1 शीशी में 10 डोज ही होते हैं।

ट्रांसपोर्टेशन के दौरान टूटने से भी नुकसान होता है

इस वैक्सीन के वेस्ट होने की दूसरी बड़ी वजह कई बार ट्रांसपोर्टेशन के दौरान इस वॉयल का ब्रेक हो जाना है। जिसके चलते भी वैक्सीन बर्बाद होती है। हालांकि इसकी संख्या काफी कम है। विशेषज्ञों का कहना है हर वैक्सीन में उसकी वेस्टेज की एक परमीसिबल सीमा होती है जो कि 10 प्रतिशत होती है और उत्तर प्रदेश में पहले 9.4 फीसदी इसकी वेस्टेज थी, जो सीमा से कम ही थी। वर्तमान में उसे बहुत कम करके 7.3 प्रतिशत किया गया है।

वहीं इस वैक्सीन में ओपन वॉयल पॉलिसी ना होना भी बर्बादी की एक वजह रही है। वास्तव में देश में कई ऐसे वैक्सीन हैं जिन्हें एक बार खोलने के बाद उसे कोल्ड चैन हैंडल के रखे जा सकता है, लेकिन कोरोना वैक्सीन के साथ यह ओपन वॉयल पॉलिसी लागू नहीं है। यानी एक बार इसे खोलने के बाद अगर 4 घंटे के भीतर सब डोज नहीं दिया गया तो ये वेस्ट हो जाएगा। इसे कोल्ड चैन में संभाल के नहीं रखा जा सकता है।

पोर्टल में समस्या आ रही है

इसके अलावा पहले शुरू में वैक्सीन के बर्बाद होने का एक कारण यह भी की पोर्टल में काफी कठिनाईयों के साथ आ रहा था। खासकर जिलों में क्योंकि यहां लोगों को वैक्सीन तो लग जाती थी लेकिन वह पोर्टल पर अपडेट नहीं हो पाती थी। जिसके कारण जो आंकड़े आते हैं उसमें वैक्सीन का इस्तेमाल ज्यादा होता था, लेकिन वह कम लोगों को लगना दिखता था। विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में सबसे ज्यादा वैक्सीन का वेस्टेज हो रहा है। जबकि यूपी में तो यह स्वीकृत सीमा 10 प्रति से कम ही थी। जिसे 7.3 प्रतिशत किया गया है और आगे 5 प्रति तक लाने की कोशिश की जा रही है।

आपको बता दें कि यूपी के पांच जिलों में कोरोना वैक्सीन का वेस्टेज सबसे ज्यादा है। जिसमें प्रयागराज में 15 प्रतिशत, लखनऊ में 14 प्रतिशत, चित्रकूट में 14 प्रतिशत, आजमगढ़ में 13 प्रतिशत और बरेली में 12 प्रतिशत तक है। जबकि सबसे कम वेस्टेज महोबा में 0 प्रतिशत, श्रावस्ती में 0.5 प्रतिशत, पीलीभीत में 0.83 प्रतिशत, चंदौली में 1 प्रतिशत और काशांबी में 1.2 प्रतिशत है।

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