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कोरोनोवायरस के खिलाफ लड़ाई में नया उत्साह कैसे फिर से उदाहरण बन गया

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कोरोना संक्रमण कंट्रोल को लेकर न्यूज़ीलैंड को तारीफें मिली हैं.

न्यूज़ीलैंड में 26 फरवरी 2020 को पहला कोरोना पॉज़िटिव (कोरोना पॉजिटिव) केस मिला था और एक साल से ज़्यादा देर के बाद इस छोटे लेकिन खुशहाल देश में क्या आंकड़े हैं? एक पूरे साल से भी ज़्यादा देर में यहां महज़ 2507 केस (कोविद -19 मामले) आए, जिनमें से वर्तमान में 100 से भी कम एक्टिव केस (एक्टिव केस) हैं और मौतें सिर्फ 26 हुईं। याद रखने की बात यह भी है कि इस देश की आबादी 50 लाख से कम है। वास्तव में, न्यूज़ीलैंड अप्रैल 2020 में ही वाहवाही पानेने लगा था और कोरोना पर ओवर (महामारी निवारण) पाने के मामले में आगे निकल गया था। यह करिश्मा इस देश ने फिर से दिखाया।

भारत हो या यूरोप, दुनिया के कई देश जब कोरोना की दूसरी, तीसरे दौर की चपेट में दिखे, तब भी न्यूज़ीलैंड ऐसे मुल्क बनकर सामने आएं, जहां कोरोना का खतरा भी कम है और डर भी। इसके पीछे खुशकिस्मती नहीं, बल्कि एक सोची समझी रणनीति रही। एक सकारात्मक नेतृत्व और विज्ञान आधारित कदम, जिसने न्यूज़ीलैंड को फिर मिसाल बनाया।

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न्यूज़ीलैंड के पांच बड़े और कड़े फैसलेये वो कदम रहे, जिनके दम पर न्यूज़ीलैंड ने वैश्विक महामारी से सामना में बाजी मारी। ये फैसले बड़े थे और कठिन समय में बेहद कड़े थे, लेकिन बेहद कारगर साबित हुए।

संक्रमण और महामारी को गंभीरता से लेने की बानगी देती यह तस्वीर द कन्वर्सेशन से साभार।

1. अनुशासन: कोविद -19 को लेकर सावधानी से संबंधित जो गाइडलाइन्स जारी की गई, उनका पालन करने के लिए किया गया। फैसिट और सैनिटरीकरण की बात हो या सोशल डिस्टेंसिंग की, बिरितव ने इसमें कभी ढील नहीं आने दी और लोगों ने भी इसे गंभीरता से लिया।

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2. गो अर्ली, गो हार्ड अप्रोच: न्यूज़ीलैंड में जब कोविड का पहला केस आया, तो एक महीने से भी कम समय के भीतर पूर्ण लॉकडाउन का फैसला किया गया। 26 मार्च 2020 को पीएम जैसिंडा आर्डर्न ने यह घोषणा कर दी थी, जबकि बाकी देशों ने महामारी के और भयावह होने तक का इंतजार किया था।

3. विज्ञान का आधार: सरकार ने लॉकडाउन से लेकर सावधानियों तक और बचाव से लेकर इलाज तक जितने भी कदम उठाए, उनका वैज्ञानिक आधार रहा। साथ ही, इस बारे में लोगों को लगातार जागरूक किया गया।

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4. समय से बचाव: न्यूज़ीलैंड ने समझा कि केवल 20% केस ही आशतर परिवर्तनों के कारण इसलिए यह बात तय की गई कि आरक्षण ही महत्वपूर्ण है। इसके तहत संक्रमण न फैले इसके लिए सामूहिक गतिविधियों पर पाबंदी के कदम भी उठाए गए और लोगों से अपील भी की गई।

5. उतावलेपन से परहेज़: खबरों में फंसकर जल्दबाज़ी से बचना न्यूज़ीलैंड की सफलता की खास वजह रही। दुनिया में जब कोरोना केस ढलान पर दिखे, तब भी इस देश ने अपने नियम कायदों और दिशानिर्देशों में ढील नहीं दी।

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साल 2020 में इस तरह न्यूज़ीलैंड ने कोरोना पर कंट्रोल किया था

फिर से कैसे काम किया?
इस साल की शुरूआत से ही कोरोनावायरस का प्रकोप नए सिरे से कई देशों को हैरान करता रहा। लेकिन न्यूज़ीलैंड टिलारीबन इससे दूर ही रहा। 22 मार्च से 4 अप्रैल के बीच अगर नए केसों की बात करें तो न्यूज़ीलैंड में सिर्फ 45 नए मामले आए। ये बीते दो सप्ताह में भारत के प्रतिदिन नए केसों का आंकड़ा देखें तो 22 मार्च को 40,000 से ज्यादा नए मामले थे जो हर दिन लगातार बढ़ते रहे 4 अप्रैल को 1 लाख का आंकड़ा पार हो गया।

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इसी तरह, यूरोप सहित कई और देशों की हालत भी चिंताजनक दिखती रही, लेकिन न्यूज़ीलैंड ने एक बार फिर अपनी कामयाबी रिपलाई की। 26 जनवरी 2021 को आर्डर्न ने कहा कि इस पूरे वर्ष केवल न्यूज़ीलैंड के बॉर्डर तक हीरीबन बंद रहेंगे क्योंकि केवल न्यूज़ीलैंड में ही हालात में होंगे, लेकिन अन्य देशों के वायरस आने का खतरा रहेगा। साथ ही, उन्होंने यह भी कहा कि कुछ पड़ोसी देशों के साथ व्यापार के इंतजाम किए जाएंगे और व्यापारिक ट्रांसपोर्ट भी।

वास्तव में न्यूज़ीलैंड ने जल्दी खतरे से छुटकारा पाकर अर्थव्यवस्था के झटके से जल्दी उबरने की नीति अपनाई और को विभाजित के संकट से निपटने के मामले में ‘डाक देश’ के तौर पर प्रकट किया। अब भी न्यूज़ीलैंड में यात्रियों के लिए बेहद कड़े नियम लागू हैं। सीएनएन की रिपोर्ट के मुताबिक पार्टनर, आश्रित और महत्वपूर्ण वर्कर, न्यूज़ीलैंड के बशिंदे ही यात्रा कर सकते हैं। जबकि इसके अलावा यात्रा करने के लिए बहुत ज़रूरी कारण और पहले से मंज़ूरी होना ज़रूरी है।

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कड़े नियम, प्रतिबंधों का पालन और समय से लिये गये निर्णय न्यूज़ीलैंड को फिर मिसाल बनाने की बड़ी उज्जवल साबित हुई हैं। वहीं, न्यूज़ीलैंड में वैक्सीनेशन एक स्तर पर प्रबंधित भी दिख रहा है तो एक स्तर पर चुनौतीपूर्ण भी।

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कोरोना के खिलाफ जंग में न्यूज़ीलैंड की प्रधानमंत्री जैसिंडा आर्डर्न के नेतृत्व को खासी वाहवाही मिली।

न्यूज़ीलैंड में वैक्सीनेशन
पीएम आर्डर्न दावा कर चुके हैं कि उनके देश में पूरी आबादी को दिए जाने के हिसाब से पर्याप्त वैक्सीन जुटा ली गई है। इंटरनेशनल मीडिया के मुताबिक न्यूज़ीलैंड सरकार ने 85 लाख अतिरिक्त डोज़ों के लिए डील मार्च में की है। इसके बाद यहाँ की 40 लाख से ज़्यादा की आबादी के लिए इतना स्टॉक पर्याप्त समझा जा रहा है। यह नहीं है, सरकार 16 साल से ज़्यादा उम्र के हर नागरिक को मुफ्त वैक्सीन देने की घोषणा कर चुकी है।

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लेकिन समस्या यह है कि यहां वैक्सीन को लेकर चिंताएं बनी हुई हैं। एक तो यहां लोगों में वैक्सीन को लेकर आ रही तमाम खबरों को लेकर एक हिचक और डर बना हुआ है। दूसरी ओर, सरकार वैक्सीन देने के एक प्रभावी सिस्टम को लेकर भी चुनौतियों से जूझ रही है। वर्तमान सरकार इस मामले में वैज्ञानिक नज़रिये की अप्रोच अपनाकर लोगों को वैक्सीन के लिए प्रोत्साहित करने में जुटी है।

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