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पायलट अभिनंदन की वापसी के दौरान भारत में बनी हुई यह फिल्म | विंग कमांडर अभिनंदन | विंगरर अभिनंदन | फिल्में जो अभिनंदन की रिलीज के साथ हुईं फिल्म समीक्षा कैसी है लुका छुप्पी में कार्तिक आर्यन और कृति सैनॉन की केमिस्ट्री

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 पायलट अभिनंदन की वापसी के दौरान भारत में बनी हुई यह फिल्म |  विंग कमांडर अभिनंदन |  विंगरर अभिनंदन |  फिल्में जो अभिनंदन की रिलीज के साथ हुईं  फिल्म समीक्षा कैसी है लुका छुप्पी में कार्तिक आर्यन और कृति सैनॉन की केमिस्ट्री

निर्देशक लक्ष्मण उतेकर की फ़िल्म लुक छुप्पी हमे सीधी मुद्दे पर लाती है और मुद्दा है कि भारत के छोटे शहरों में लिव-इन में रहना आज भी एक टैबू है और लोग ऐसे किसी कपल को देख आंखे तरेर लेते हैं। फिल्म में मौजूद स्टार और यूथ आइकॉन नदीम खान भी अनजाने में भारतीय संस्कृति के खिलाफ कुछ बातें बोल कर अचानक से लोगों के निशाने पर आ जाती है। दिलचस्प बात यह है कि लिव-इन रिलेशनशिप्स पर पहले अर्थ, सलाम नमस्ते और शुद्ध देसी बाइबिल जैसी फिल्में बन चुकी हैं लेकिन बॉलीवुड में ऐसी फिल्में कम ही हैं।

लुका-छुपी भी दो छोटे शहरों की कहानी है, मथुरा और ग्वालियर की पृष्ठभूमि पर बनी ये कहानी इसके लीड हर गुड्डू (कार्तिक आर्यन) और रश्मि (कृति सैनॉन) के आसपास घूमती है। गुड्डू एक लोकल केबल चैनल का निडर रिपोर्टर है और एक पत्रकार बनने की चाहत रखने वाली रश्मि तब मुसीबत में आती हैं जब वो लिव इन में रहने का फैसला करते हैं।

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संस्कृति रक्षा मंच और अपने ही घरवालों से बचने के लिए गुड्डू और रश्मि तरह तरह के बहाने और प्रपंच रचते हैं और अपने रिलेशन को छिपाने की कोशिश करते हैं। कैमरामैन और दोस्त अब्बास (अपारशक्ति खुराना) की मदद से अपने प्यार को छिपाते बचाते गुड्डू और रश्मि की कहानी है ‘लुका छुप्पी’असल ज़िंदगी में भी इस मुद्दे पर देशभर के न्यूज़ चैनल की कड़ी आलोचना कर रहे हैं और इसके प्रति लोगों में भी जागरुकता है। है, पर अभी भी लिव इन वनज़ज़ी सी चीज़ है। रोहन शंकर का स्क्रीनप्ले इस मुद्दे में गहरा नहीं उतरता, मूल रूप से ज़िंदगी में जिस तरह से प्यार करने और साथ रहने वालों का मुँह काला किया जाता है या उन्हें पीटा जाता है, फिल्म इस मामले में थोड़ी हल्की रहती है। फिल्म लोगों के नज़रिए से ही इस मुद्दे को देखने की कोशिश करती है।

फिल्म में एक गुरुजी हैं जो राधा कृष्ण की कहानी से लिव इन को जोड़ते हैं और एक दादी माँ हैं जो अपने ज़माने के खुलेपन और लॉजिक की बात करते हैं लेकिन इसके बाद शंकर चीज़ों को सतह पर ही रखते हैं और कॉमेडी के आसान रास्ते को चुनते हैं क्योंकि वे ऑडियंस को समझते हैं। लेकिन फिल्म को कॉमिक एलिमेंट से उपर ले जाने में वे कमज़ोर बने रहते हैं।

पंकज त्रिपाठी द्वारा प्लेए गए किरदार बाबूलाल को और बड़ा किया जा सकता था और उनके द्वारा बोले गए मुख्य सवांद भी उतना ही प्रभावशाली नहीं करते जितना वो फुकरे में करते हैं। किस्मत की बात है कि कहानी अपने आप में आपको कॉमेडी क्रिएट करने के मौके देती है। एक तांक झांक करता पड़ोसी, एक शैतान भतीजा जो राज़ जानता है। साथ ही फिल्म के लीड किरदार भी अपना काम बखूबी प्लेते हैं।

चाहे दोस्त के किरदार में अपारशक्ति खुराना हों या लड़की के पिता के किरदार में राजनीतिक रसूख रखने वाले विनय पाठक और भले ही पंकज के किरदार का काम कमज़ोर है, उनका पर्दे पर आना ही आपको हंसा देगा।

बरेली की बर्फी के बाद अब मथुरा की लड़की का किरदार खेलती कृति के अंदर पहले से ज्यादा आत्म विश्वास आ गया है। लेकिन फिल्म की जान हैं कार्तिक आर्यन। प्यार का पंचनामा और सोनू के टीटू की स्वीटी जैसी फिल्मों में अपनी कॉमेडी की धाक जमा चुके कार्तिक ने इस फिल्म से साबित कर दिया है कि कॉमेडी के मामले में वो करीब हैं।

लक्ष्मण उतेकर निर्देशकों की लिस्ट में नए हैं और उनका काम अच्छा है। छोटे शहरों की कहानियों को कहने का नया चलन है और ये कहानियां हिट भी हो रही हैं – लुका छुप्पी भी इसी कड़ी में एक नाम है। इस फिल्म में वो बात है जो लिव इन के मुद्दे पर फिर से बहस छेड़ सकती है, बहस, जिसकी ज़रुरत भी है।

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