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बाटला हाउस मूवी की समीक्षा: जॉन अब्राहम की स्वतंत्रता दिवस पर दशभक्ति से लबरेज फिल्म सीट से उठने नहीं देती

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बाटला हाउस मूवी की समीक्षा: जॉन अब्राहम की स्वतंत्रता दिवस पर दशभक्ति से लबरेज फिल्म सीट से उठने नहीं देती

‘बाटला हाउस’ के एक जरूरी सीन में यह दावा किया जाता है कि यह एक पक्षीय फिल्म नहीं है। इस दृश्य में कोर्टरूम दो पक्षों के लोग अपना-अपना पक्ष रखने वाले होते हैं। लेकिन यह अजीब लगता है, क्योंकि पूरी फिल्म एक खास धारा में बहती है। यह नहीं है, बाटला हाउस देखते हैं आप जो भी अंजाजाते हैं वह आगे चलकर सच साबित होता है। फिल्म में कुछ भी चौंकाता नहीं है। हालांकि इसके बाद भी अभिनेता जॉन अब्राहम (जॉन अब्राहम) और निर्देशक निखिल आडवाणी (निखिल आडवाणी) की जोड़ी फिल्म को ब्रेक नहीं पड़ने देती। सिम्मेटोग्राफी और बॉलीवुड की मुख्यधारा की मनोरंजक फिल्मों के सभी गुण इसमें मौजूद हैं।

जिस घटना पर ‘बाटला हाउस’ आधारित है, उसके हाउस नंबर एल -18 में 19 सितंबर 2008 को क्या हुआ था, मूल रूप से आज तक किसी को पता नहीं था। लेकिन नोहिल आडवाणी की फिल्म इसके नतीजे पर पहुंचने के लिए बेताब दिखती है। इस चक्कर में निर्देशक को कुछ प्रमुख किरदार नए तरीके से गढ़ने पड़े हैं। ये विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर से वकील और समाज सेवी तक किरदार हैं। जबकि बाटला हाउस एनकाउंटर के समय की घटनाओं टीवी पर दिखाई जा रही है। लोगों के जेहन में आज भी दोनों विश्वविद्यालयों के मारे गए छात्रों की स्मृतियां ताजी हैं।

कुछ नए किरदार गढ़े हैं बाटला हाउस में
निखिल आडवाणी ने बड़ी चालकी से शुरुआत में ही अपनी फिल्म में दिल्ली पुलिस के अधिकारी संजय कुमार (जॉन अब्राहम) के साथ एनकाउंटर के सीन को एक मिनट के भीतर खत्म कर देते हैं। इसकी पूरी उम्मीद की जाती है कि आगे चलकर इस सीन के बारे में पूरी जानकारी मिलेगी। इसी दौरान एक दूसरे अधिकारी केके (रवि किशन) की मौत हो जाती है। इससे पुलिस के भीतर की दुश्मनी का अंदेशा होता है।

बटला हाउस: जॉन अब्राहम को दशभक्ति आधारित ये तीसरी फिल्म है।

ये सब के बीच संजय कुमार की अपनी निजी तनावपूर्ण जिंदगी भी चलती रहती है। अगर संक्षेप में कहें तो बॉलीवुड की पारंपरिक बुनियादी सुविधाओं की फिल्मों में होने वाले सभी गुण मौजूद हैं। इसमें संजय कुमार के लिए सहानुभूति भी जती है।

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जॉन अब्राहम के खाते में एक बेहतर फिल्म साबित होगी बाटला हाउस
निखिल आडवाणी ने बड़ी चालकी से फिल्म में पुलिस के मूल किरदार पर कोई टिप्पणी नहीं की है। उन्होंने यह दर्शकों पर छोड़ दिया है कि वे फैसला करते हैं कि पुलिस सही है या गलत है। लेकिन फिल्म एक विचार तैयार करती है। इसमें यह एक विशेष पक्ष में खड़ी दिखाई देती है।

जॉन की ये फिल्म परमाणु और रॉ के आगे जाती है।

यह फिल्म जॉन अब्राहम के खाते में एक बेहतर फिल्मों में गिनी जाएगी। क्योंकि उनमें अच्छे मोनोलॉग (एकांकी संवाद) और अच्छी पंचालीनताएं मिली हैं। कुछ सीन्स में उन्होंने कमाल की डायलॉग डिलीवरी भी की है। आमतौर पर उनके डायलॉग बोलने के अंदाज की जमकर आलोचना होती है। लेकिन इस फिल्म में उन्होंने अपने संवाद अदायगी पर विशेष जोर दिया है। साथ ही निखिल आडवाणी की भी तारीफ करनी होगी। वे स्वाभाविक रूप से आगे बढ़ते दिखाई देते हैं।

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देशभक्ति वाली फिल्मों पर जॉन अब्राहम का फोकस
‘परमाणु’ और ‘रॉ’ के बाद जॉब अब्राहम की ये तीसरी फिल्म है जिसमें वे देश के लिए लड़ते नजर आते हैं। वह देशभक्ति आधारित फिल्मों के नए ब्रांड एक्टर बनते जा रहे हैं। बटला हाउस इसी लाइन को आगे बढ़ाती है। साथ इस फिल्म में उन्हें एक गंभीर अभिनेता के तौर पर पहचान मिल सकती है। क्योंकि उन्होंने अपने किरदार को पर्दे पर बेहद शानदार अंदाज में उतारा है। उनका बॉडी लैंग्वेज देखकर लगता है कि उन्होंने अपने किरदार पर बहुत मेहनत की है।

बटला घर

बटला हाउस के सिम्मेटोग्राफी की तारीफ होनी चाहिए।

यही कारण है कि बाटला हाउस 2 घंटे 20 मिनट तक दर्शकों को सीट पर बैठाए रखता है। फिल्मोंम में मृणाल ठाकुर के अभिनय की तारीफ की करनी होगी। उनके हिस्से ज्यादा नहीं आए हैं। लेकिन सीमित समय में वह पर्दे पर प्रभाव जाने में सफल रही हैं। नूरा फतेही के ‘ओ साकी साकी’ आइटम सांग को भी दर्शक बड़े पर्दे पर देख सकते हैं।

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