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मैं कबीर सिंह की तरफ क्यों देखूँ? मेरा वास्ता तो प्रीति से है!

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 मैं कबीर सिंह की तरफ क्यों देखूँ?  मेरा वास्ता तो प्रीति से है!

अब जब कबीर पर बात हो ही रही है। तो सिनेमाघर तक पहुंचने से पहले मैं जान चुका था, वो एक नशेड़ी, बदतमीज़, प्रेमिका को प्रॉपर्टी समझने वाला शंख है। उसे समझ नहीं आता क़ायदे, क़ानून, वो जो कर ले वही सही है। तो अब जब बात हो ही रही है तो बात कर ही ली जाए। मैं सब सुनकर गया और सबकुछ देखने के बाद नहीं हुआ मुझे नफरत कबीर से। मुझे थोड़ी और खीज हो गई समाज पर, अपनी परवरिश पर, अपने पिता पर, थोड़ी और गुस्सा आ गई अपनी माँ पर।

क्या प्रीति को चूम लेना कबीर की गलती है?

फ़िल्म में कबीर की प्रेमिका प्रीति है। कबीर उसका प्रेमी है या नहीं, ये मतलब ही नहीं रखता है। क्योंकि प्रीति को ये सिखाया ही नहीं गया था। पहली मुलाक़ात में कबीर प्रीति के गाल पर कौन करता है और प्रीति चुपचाप चली जाती है, न गुस्सा, न दुख, न कोई प्रतिरोध। इसमें ग़लती कबीर की नहीं, ग़लती प्रीति की परवरिश की है। उसे सिखाया ही नहीं गया कि मर्द को न कैसे करना है, जो ताक़त लगती है एक आदम को धक्का देने में, कैसे चीख सकते हैं जब कुछ बुरा लगे। उसे बताया गया पापा घर में आ जाओ तो तुम कमरे में चले जाओ। भाई टीवी देख रहे हो तो रिमोट नहीं छीनना। वो तुमसे 8 साल छोटी है लेकिन बर्ताव बाप जैसी होगी। उम्र छोटी है लेकिन भाई का रिश्ता बड़ा है। 24 साल की प्रीति से उसका 16 साल का भाई बदतमीज़ी कर रहा है। उसे इतना अधिकार होता है कि वह किसी पर भी हाथ उठा ले क्योंकि उसने उसकी बहन से प्रेम करने की जुर्रत की।

एक सीन में प्रीति की माँ कहती हैं, “इसके पापा को आने वाले, हमारे यहाँ सभी फैसले के साथ बैठकर होते हैं।” और जब पापा आते हैं तो वो अकेले अपनी मर्ज़ी से कबीर को घर से धक्के मार कर निकाल देते हैं, तब प्रीति की मर्ज़ी का मतलब नहीं रहता कि वो बात करना चाहती है। उससे ग़लती हुई लेकिन वह तब भी बैठकर बात करना चाहता है। दरअसल ये प्रीति की माँ भी जानती हैं कि फैसले सबकी मर्ज़ी से नहीं हैं, बल्कि सबकी मर्ज़ी वो होता है जो पापा का फैसला होता है।

कबीर सिंह

हमारे यहाँ लड़कियों को समुराई भी इसलिए बनाया जाता है कि बच्चों को अच्छे से पाल सकोगी, घर गृहस्थी बढ़िया चला सकोगी। एक महिला पढ़ी मतलब एक परिवार पढ़ाया। अगर नौकरी करी तो पति का हाथ बंट जाएगा थोड़ा, लेकिन उससे ज्यादा मेहनत करके लौटने के बाद खाना आपको ही बनाना है। पैदा होने के साथ घुट्टी दी जाती है कि पराए घर जाना है, कभी मज़ाक में में, कभी प्यार में, कभी गुस्सा में जाहिर किया जाता है कि हम आपकी परमानेंट कस्टडी नहीं लेने वाले। आपको किसी और को पीसीओवर करना है। फ़िर अपने पति के साथ जाना गोआ, मसूरी, शिमलाचल।

मुझमें तो इतनी कमियां हैं, तुम मुझे याद रखोगे?

लेकिन कठिनाई तब होती है जब लड़की अपनी मर्ज़ी के गार्जियन के पास जाना चाहती है। प्रीति ने कबीर को क़ुबूल कर लिया तो क्या नया कर लिया, जो हमेशा से निर्दिष्ट किया गया उसे स्वीकार कर लिया गया। उसके लिए काफी था कि वह उसकी कस्तडी में जीन्स और जैकेट पहन सकती थी। खुल कर हँस सकता था, ज़िद करने का नाटक कर सकता था, चार बार थप्पड़ खाकर एक थप्पड़ का जवाब दे सकता था। प्रीति को बहुत बुरा और कम बुरा में से चुनना था, सो उसने चुन लिया कबीर।

वो लड़की जिसे बचपन से पर असर होने की ताकीद दी गई, सन्नी ऐसे डालो, ऐसे मत हँसो, इतनी रात को मत निकलो, भाई से मत लड़ो। उसका पहला सवाल यही होता है, मुझेमेंट तो इतना कम हैं और वह उतने में ही आनंदित हो जाता है क्योंकि उसे भी नहीं मिला है।

प्रीति

क्या सिर्फ कबीर से सवाल करना जायज़ है?

कितने दोगले हैं हम, कबीर से नफरत किए हुए आधे हुए जा रहे हैं लेकिन प्रीति के बाप से सवाल नहीं कर पा रहे, अपनी मर्ज़ी से शादी करना चाहते हैं तो आप किसी से भी शादी करके सज़ा दोगे उसे। हम क्लाइमेक्स तक उम्मीद करते हैं कि प्रीति को कबीर ढूंढेगा, लेकिन उसके पिता से नहीं पूछते तुमने उसे क्यों समझा। सिर्फ इसलिए कि उसने कहा कि अब तक तुम कह गए, अब बस एक चीज़ करनी चाहिए मुझे अपनी मर्ज़ी से। क्यों नहीं प्रीति गई कबीर के पास और एक थप्पड़ मारकर पूछा, प्यार के इतने दावे थे तो हो कैसे इस 680ine के साथ? क्यों प्यार की निशानी के नाम पर अकेले झेलती रही वह नौ महीने। अगर कबीर नहीं आता तो बच्चे को क्या बताती मर्द ज़ात और प्यार के बारे में?

क्यों नहीं प्रीति अपने पापा पर गुस्सा दिखाती, जब वो कबीर के घर पहुंच जाती। उसने पूछा क्यों नहीं, कि आज मुझे मेरे दूसरे कस्टोडियन ने छीन कर ही दम लिया और आपकी ज़िंदा सूची कम की तो आ गए मेरे प्यार को समझने के दावे करते हुए। क्यों नहीं प्रीति कबीर से सवाल कर सकी कि आज अपने लिए मुझे मेरे पापा से लड़ने को बोल रहे हो, ‘बी अ वुमन’ का नारा दे रहे हो तब कहां गया था मेरे अंदर की वुमन जब मुझे पूछे बिना पूछे पूरे कॉलेज में मुझे अपनी खुद की सलाद घोषित कर दिया गया था। जब ज़बरदस्ती करने के बाद भी आपने मुझसे नहीं पूछा था कि वह चुम्बन, जो पहले प्यार का पहला चुम्बन था शायद।

प्रीति ३

सवाल उस लड़की से भी होना चाहिए कि क्यों नहीं कबीर के हाथ से चाकू छीनकर उसकी गर्दन पर रख देना था। क्यों नहीं उस नौकरानी को इतना अक़्ल आई कि ज़्यादा कुछ न सही तो धक्का देकर बैठ कर कबीर के सीने पर और FAQ, बोल कौन ताउतवर? क्यों नहीं प्रीति की मम्मी ने कहा कि मत करो शादी, क्यों नहीं वह एक औरत से दूसरी औरत की तकलीफ समझ सकी। हम औरत के सशक्तिकरण की मांग भी मर्द से करते हैं, हमारे अच्छे दिनों की उम्मीद भी हमें मर्द से है। हम औरतों को समझाना ही नहीं चाहते कि जीवन में अपने लिए आपको सब ख़ुद करना होगा, मर्द के साथ हो सकता है, नेतृत्व नहीं कर सकता।

ज़माना भर गया है कबीरों से!

मैं पहले भी कह चुका हूँ, फ़िर कह रही हूँ कि फिल्में समाज का आईना नहीं होती हैं, लेकिन फिल्में समाज का अक्स हैं। वो आपके लिजलिजेपन को आपके सामने परोसते हैं तो थोड़े अच्छे हो जाते हैं आप। ज़माना भरा पड़ा है कबीरों से। एक कबीर से नफरत करने के लिए ज़िन्दगी के हर मर्द से नफरत करनी पड़ेगी। सबमेंट थोड़ा-थोड़ा बंटा हुआ है वो। हमें सब कमियां एक ही पैकेज में मिल गई तो थोड़ा ओवराडोज़ हो गया। कितनी कबीर मेरी अपनी ज़िंदगी में हैं। आप पूछ रहे हैं कबीर को घमंड किस बात का है, इसलिए गुस्सा किस बात का है। अरे वो टॉपर है, दस बच्चों से बेहतर है। उसे घमंड है कि उसकी माँ-बाप को उसकी तुलना नहीं करनी चाहिए। उसकी टीचर ने हमेशा कहा है कि, बैट ही इज़ वेरी चाहे ये एकेडेमिक्स, स्कूल की ट्रॉफियां यही ला होगा। उसकी पढ़ाई के पीछे उसका हर ज़िद छुपा दिया गया। तबसे जब वह खुद समझ गया था।

मेरा अपना लिंगिन, मेरा सगा शेरिन है कबीर, एकेडेमिक्स में अच्छा है और हम पर हाथ भी उठाया है, उम्र में मैं बड़ी हूँ उसके लिए, बचपन में मेरा सिर फोड़ दिया तो मेरी अपनी बुआ ने कहा, “इसे दूसरे स्कूल में डाल दो,, मेरा लड़का थोड़ा शैतान है और ये उसके साथ खेलेगी ज़रूर। ” एक बार उसने मेरी छोटी बहन को मारा, हम फूफा जी से शिकायत करने गए तो उन्होंने साफ कहा, “मरखन्ने बैल से दूर रहो बेटा, वह तो ऐसा ही है।” फूफा ने उसको कुछ नहीं कहा क्योंकि वह उनके दम्भ को खुराक दे रहा था। मेरा बेटा, टॉपर बेटा, होशियार बेटा, मेरा परवरिश … उसे इतना एडवांटेज तो मिल ही सकता है। इस थोड़े-थोड़े एडवांटेज से ही कबीर बनते हैं, जो हेशी लगते हैं लेकिन हमारा ही बायप्रोडक्ट होते हैं। कबीर हूर नहीं है, कबीर हमारी खीज की एक मिसाल भर है। जैसा समाज वैसा कबीर है।

मेरा अपना छोटा भाई, जिसे गोदी में पालकर बड़ा किया, खाना छोड़कर जिसकी पॉटी साफ की, वे ऊँची आवाज़ में बात करने से पहले दो बार नहीं सोचता। हालांकि मम्मी पापा डांटते हैं लेकिन समाज ने समझा दिया है कि उसे, मर्द हो और ये हक है।

अपने हिस्से के दर्द पर सबका हक़, फिर प्यार पर वो हक़ क्यों नहीं?

फ़िल्म में एक डायलॉग है, “अपने हिस्से का दर्द सबको झेलना पड़ता है इसमें ख़लल मत डालो।” कोई ये क्यों नहीं अपने हिस्से की खुशी को दर्शाता है, अपने हिस्से का प्यार सबको लेना पड़ता है उसे भी मत छीनो। ये जितने लोग ललाहोट हुए जा रहे हैं कबीर और उसके इश्क़ पर, वो दरअसल अपने नाकाम इश्क़, अपनी दबी हुई ख्वाहिशों की झलक देख रहे हैं। कैसे लोग जो उस हॉल में बैठे पिक्चर देख रहे थे, किन्नरों की शादी किसी और से करवा दी जाएगी क्योंकि घरवाले नहीं मानेंगे।

कबीर प्रीति

जब कबीर कहते हैं शादी हो गई है तो क्या? वो मेरी बंदी है। हाँ उसके बच्चे हो जाएंगे तो क्या, प्यार थोड़ा ख़त्म होगा, वो बंदी मेरी ही रहेगी न। बहुत कहानियाँ हमने पढ़ी हैं जब लव अपने पार्टनर्स की मौत के बाद बुढ़ापे में शादी करते हैं, तो वो हमें बड़ा रोमैंटिक लगता है। कबीर ने वही बात जवानी में कह दी तो हमें भ्रम हो गया, क्योंकि हमें सिखाया गया है, प्रेम त्याग है, अंधण है, दूसरों की खुशी है, ये है वह है सब है लेकिन वह नहीं, जो आप अपने लिए करो। प्यार बहुत बार ख़त्म हो गया है? क्या कस्तडी का न्याय करने से सोच का और जतन संस्था का भी कॉन्ट्रैक्ट हो जाता है?

वन टाइम वॉच फिल्म है

फ़िल्म का म्यूजिक अच्छा है लेकिन फ़िल्म में सही से इस्तेमाल नहीं किया गया है। बैकग्राउंड म्यूजिक काफी कसा हुआ और दमदार है, सीन को गति देने वाला है। बख्शी खुशनसीब हैं वे लोग जिनकी ज़िन्दगी में शिवा जैसा दोस्त है। ये शिवा भी आसमान से नहीं टपकते हैं, इनमें ऐसे लोग हैं। मेरा भी ऐसा ही एक दोस्त है। सुरेश ओबेरॉय और कामिनी कौशल को बहुत दिन बाद अच्छा लगा। बक्ती कियारा की अगली फिल्म का इंतज़ार है जिसमें उनका डायलॉग हो। फ़िल्म वन टाइम वॉच है।

अंत में बस इतना ही, इतना आतंकी होकर भी कबीर, प्रीति को हासिल नहीं कर पाता है। वह सब कुछ क़ाबू कर लेता है लेकिन समाज के सरपंच बने बैठे उसके पापा से हार जाता है। समाज इतना मज़बूत है कि आशिकों को अलग करने के लिए हज़ार दलीलें हैं लेकिन प्यार बने रहने देने के लिए भी बहुत नहीं। चाहने वालो को कबीर यूँ ही पसंद आया क्योंकि उसने वो कर दिखाया जो हम कर नहीं सकते।

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