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वेनिस की फिल्म फकीर की समीक्षा फरहान औतार अन्नु कपूर अक्स

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वेनिस की फिल्म फकीर की समीक्षा फरहान औतार अन्नु कपूर अक्स

कुछ फिल्में होती हैं जिनके पीछे की कहानी इतनी होती है दिलचस्प है होता है जब खुद फिल्म नहीं होती। निर्देशक आनंद सुरापुर की फिल्म फकीर ऑफ वेनिस भी ऐसी ही एक फिल्म है क्योंकि ये फिल्म किसी ज़माने में फ़रहान अख्तर का एक्टिंग डेब्यू होने वाली थी।

लगभग 14 वर्षों से प्रकट का इंतज़ार कर रही यह फिल्म अब चयनित हो गई है। इस फिल्म के बनने के पीछे का किस्सा पेचीदा है। निर्देशक होमी अदजानिया जो साइरियस, कॉकटेल और फ़ंडिंग फैनी जैसी फिल्में बना चुके हैं इस फिल्म को लिखते समय अपना डेब्यू नहीं कर पाए थे। उन्होंने इस फिल्म की कहानी लिखी और निर्माताओं को बेच कर उन छुट्टियों पर निकल गए। राजेश देवराज ने उनकी इस कहानी को स्क्रीनप्ले में बदल दिया और ये कहानी सामने आई।

फिल्म की कहानी मुंबई के लड़के आदी कॉन्ट्रैक्टर (फरहान अख्तर) की है जो एक गरीब मजदूर सतार (अनु कपूर) के साथ मिलकर पश्चिमी सभ्यता को भारत का स्पिरिचुअलिज्म बताते हैं। वेनिस, इटली के इस शहर में एक प्रसिद्ध कलाकार खिड़कियों के मालिक को एक ऐसी फकीर की तलाश है जो उसकी खिड़कियों में आकर एक चमत्कारी ट्रिक दिखा रही है।

रणवीर सिंह की क्लास लेंगे कपिल देव, तीन हफ्ते में पहचान नहीं करेंगे आप!आदी किसी प्रॉजेक्ट को कभी न नहीं कहता और इसलिए वह इस फकीर की तलाश में निकल जाता है। लेकिन वह किसी फकीर को लाने की बजाए सतार को लाता है जिसने खुद को रेत में लंबे समय तक दफ्न करने की कला सीख ली है। यह एक ट्रिक से सतार को आदी एक फकीर बना देता है और वह वेनिस में लोकप्रिय हो जाते हैं।

राजेश देवराज का स्क्रीनप्ले होमी की ओरिजनल कहानी से थोड़ा नाइंसाफी करता लगता है। एक बेहतरीन डार्क कॉमेडी बनते बसते बस एक हल्की कॉमेडी बन जाती है। फिल्म पर पैसा कम लगाया गया है जो दिखता है। वाराणसी और वेनिस जैसे शहरों में फिल्माई गई इस फिल्म का संगीत, खराब क्वेरी इस फिल्म को थोड़ी देर बाद बासिल बना देती है।

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हालांकि फरहान का अभिनय इसे मज़ेदार बनाता है। हालांकि ये उनकी पहली फिल्म, बतौर एक्टर थी, लेकिन उनमें एक्टिंग का नैचुरल टैलेंट है और वह इस फिल्म को देखती है। वो आदी के किरदार में बहुत आसानी से फिट हो जाते हैं। वह एक साधारण जीवन जीने वाला युवक है जो मुंबई में अपनी ज़िंदगी को खुशी से जी रहा है। उनकी अभिनय क्षमता ही है जो आपको इस किरदार को पसंद करवाने लगती है और अगर ये फिल्म उसी समय प्रकट हुई होती है तो अख्तर की एक्टिंग को उतनी ही तारीफ मिलती है जितनी उनके डेब्यू ऑन रॉक ऑन ’को मिली थी।

अन्नू कपूर हमेशा की तरह सल्लिड लगते हैं और अपने किरदार में वो सही जज्बात लाते हैं। एक मज़दूर जो कुछ पाना भी चाहता है और कुछ छोड़ना भी नहीं चाहता है। निर्देशक अपने कलाकारों से अच्छा अभिनय करवा पाया लेकिन वह फिल्म को उस स्तर पर ला नहीं पाया जहां वे उसे ला सकते थे और यही इस फिल्म की दुखती रग है।

एड फिल्ममेकर्स की यही कमज़ोरी होती है कि वह फिल्म को संक्षिप्त और संजीदा बनाने में कोई कमी नहीं छोड़ते लेकिन फिल्म भारतीय ऑडियंस के गाने पर रिक नहीं उतर पाती।

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फिल्म में एक दृश्य है जहां आदी और सतार इस काम को करने के अपने कारण गिनाते हैं। जहां आदी इसे अपनी बेहतर ज़िंदगी के लिए करना चाहता था वहीं सतार अपनी मौत से अपनी बहन को एक नई ज़िंदगी देना चाहता था। इस दृश्य को फिल्म का एक मज़बूत पक्ष बनाया जा सकता था लेकिन ये सीन बस यूं ही बीत जाता है।

आदी जब अलग अलग साधुओं से मिलता है, उस प्लॉट को भी शानदार तरीके से दिखाया जाना चाहिए था क्योंकि वह कहानी में जानती है लेकिन वहां भी वह चूक जाती हैं। इस फिल्म को देखकर लगता है कि सुरापुर इस फिल्म को एक अवॉर्ड विनिंग फिल्म की तरह बनाना चाहते थे लेकिन दर्शकों के लिए इस फिल्म में कुछ खास नहीं है। ये फिल्म न कलाकार फिल्म ही हो पाती और न ही कमतर है।

फकीर ऑफ वेनिस अपने किरदार सतार की तरह ही अपेक्षाएं तो बहुत अधिक ऊंची बांधती है लेकिन फिर निराश करती है।

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