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70 साल के बूढ़े के किरदार को शानदार तरीके से खेलने ले जाते हैं सलमान खान

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70 साल के बूढ़े के किरदार को शानदार तरीके से खेलने ले जाते हैं सलमान खान

सलमान खान की लेटेस्ट ईद में की शुरूआत बेहद जोशीली रहने वाली है। फिल्मी पर्दे पर 70 साल का सलमान जब फ्रेम में आते हैं तो आपको समझ आ जाता है कि अब यहां से यात्रा मज़ेदार होने वाली है। ये वाकई हैरान करता है लेकिन सलमान खान एक 70 साल के बूढ़े के किरदार में हैं जिसका नाम भारत है। लेकिन वो सिर्फ उम्र से बूढ़ा है। अपने स्टाइल और स्वैग में वो 30 साल के नौजवान को भी नीचा दिखा सकती है।

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एक कोरियन फिल्म ‘एन ओड टू माई फादर’ (एक ऐसी इंसान की कहानी जो युद्ध के समय बिछड़े अपने पिता और बहन को याद करता है) के साथ इस आधिकारिक रीमेक में निर्देशक ने कहानी को ‘भारत’ के नज़रिए से दिखाया है। भारत, वो बच्चा जो आज़ादी और बंटवारे के समय से आता है और जो पूरे भारत को एक परिवार के नज़रिए से देखता है।

फिल्म के पहले ही सीन में नए बाज़ार की ताकतें पुराने तरीकों को बदलने की कोशिश में दिखाई देती हैं और यहीं से हमें भारत की ज़िंदगी के फ्लैशबैक में ले जाया जाता है। फिल्म की कहानी शुरू होती है एक हृद्य विदारक दृश्य से जिसमें भारत, बंटवारे के दौरान अपने परिवार से अलग हो जाता है और अपनी बुआ के घर पुरानी दिल्ली आ जाता है।

इस यात्रा में सलमान को मिलता है एक दोस्त – विलायती (सुनील ग्रोवर) और अपना गुज़ारा चलाने के लिए वो कई अजीबोगरीब काम करते हैं। इन कामों में पहले काम होता है सर्कस के अंदर मौत के कुएं में मोटरसाइकिल चलाना। इस काम में सलमान को महारत हासिल हो जाती है। मृत्यु के कुएते दृश्यों में आपको अमिताभ बच्चन के गाने ‘माई नेम इज़ एंथनी गोन्सालवेस’ की कुछ झलक भी मिल सकती है। हालांकि ये दृश्य एक दुखद अंत के साथ खत्म होते हैं और भारत एक नया रास्ता लेता है, इस नए रास्ते पर उसकी मुलाकात होती है कुमुद रैन (कटरीना कैफ) से।

भारत एक जीवन की कहानी जिसमें गंभीरता भी है और ठहराव भी है, ये आम सलमान खान की फिल्मों से अलग है। निर्देशक अली अब्बास ज़फर इस कहानी को बहुत सहजता से विषय की ओर ले जाते हैं। ऐसा लगता है कि मेगा फिल्में उनके लिए स्वाभाविक रूप से सी चीज़ हैं। एक कहानी जो दशकों में फैली किसी महागाथा जैसी है, ज़फ़र इस कहानी को बेहतरीन तरीके से अपने नियंत्रक में रखे हुए हैं और बंटीने नहीं देते हैं। हालांकि भारत के ‘हीरोपन’ को दिखाने के लिए स्क्रिप्ट में ज़रूरत से ज़्यादा जगह दी गई है जो कहीं कहीं अटपटी लगती है।

इस फिल्म में कुछ हिस्सों को काटा जा सकता था। लंबी स्क्रिप्ट हमेशा दर्शकों का ध्यान महत्वपूर्ण दृश्यों से भी हटा लेती है। ज्यादा तीखी एडिटिंग के ज़रिए इस फिल्म को और स्मूथ और शायद एक बॉलीवुड क्लासिक में तब्दील किया जा सकता था लेकिन ऐसा नहीं होता और फिल्म लंबी खिंचती चली जाती है।

हालांकि इस दुखद कमी को भरते हैं सलमान खान। वे इस फिल्म में काम के लगे हैं और अपनी क्षमताओं का पूरा इस्तेमाल करते हैं। ये उनकी सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में से एक हो सकती है। एक फिल्म जो मेरे दिमाग में बनी रहती है वह है – जब भारत का दोस्त विलायती उसे अपने पिता से मिलने की उम्मीद छोड़ देने के लिए कहता है। कटरीना कैफ भी आपको प्रभावित करती हैं। हां इस फिल्म से एक चीज़ जो निकल कर आ सकती है, वो ये कि सलमान 70 साल के लोगों के लिए एक नई स्टाइल स्टेटमेंट तैयार करने दें।

सलमान की को-स्टार कटरीना कैफ ने गंभीर किरदारों को करने की कोशिश की है और वो इसमें सफल होते दिख रहे हैं। वो तेज़ तर्रार, सीधी बात करने वाली कुमुद के किरदार में जती हैं और हल्की झुर्रियो और सफेद होते बालों के साथ वो आपको चौंका देती हैं। एक अभिनेत्री के तौर पर वे वास्तव में अनुभवी हो गई हैं। ये कहना बिल्कुल सही होगा कि इस फिल्म के कुछ दिल को छू लेने वाले दृश्य कैफ-खान के बीच ही घटते हैं।

इस फिल्म में विशाल-शेखर का संगीत बेजोद तो नहीं है लेकिन ‘स्लो मोशन’ और ‘चाशनी’ जैसे गाने खुद काम करते हैं। ज़िंदा गीत आप कवि से बाहर गुनगुनाते हुए आ सकते हैं। हालांकि इस फिल्म में कई अच्छी बातें हैं लेकिन भारत में कुछ कमियां रह जाती हैं। इसके बाद भी, इस फिल्म में वो बात है जो ऑडियंस को सिनेमाघरों तक लाएगी।

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